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मेमसाहिब रिम्पी और नौकर कल्लू की पूरी रात की चुदाई

मैं रिम्पी हूँ, अमृतसर की रहने वाली। उम्र उस वक्त अठारह की थी। बारहवीं की परीक्षाएँ खत्म हो चुकी थीं और गर्मियों की छुट्टियाँ शुरू हो गई थीं। मम्मी-पापा दोनों सरकारी नौकरी में थे, इसलिए दिन का ज्यादातर वक्त घर में मैं अकेली ही रहती थी। हमारा पुराना नौकर कल्लू भी घर पर ही रहता था। कल्लू तीस साल का जवान, गाँव का साँवला आदमी था। उसका बदन कसरती – चौड़ी छाती, मजबूत बाजूएँ, मोटी जाँघें। जब वो काम करता तो उसकी पसीने से तर शर्ट उसके बदन से चिपक जाती और मसल्स साफ नजर आते। मैंने कई बार चुपके से उसे देखा था, और मन में एक अजीब-सी हलचल महसूस की थी।

एक दोपहर की बात है। गर्मी जोरों पर थी। मम्मी-पापा ऑफिस गए थे। मैं अपने कमरे में पंखे के नीचे लेटी थी, सिर्फ एक पतला सा स्लीवलेस टॉप और छोटी स्कर्ट पहने हुए। ब्रा भी नहीं पहनी थी क्योंकि घर में अकेली थी। मन बोर हो रहा था। अचानक कल्लू दरवाजे पर दस्तक देकर आया। उसके हाथ में पानी का ग्लास था। “मेम साहिब, गर्मी बहुत है… पानी पी लो।”

मैंने मुस्कुराकर ग्लास लिया। वो पास ही खड़ा रहा। उसकी नजरें मेरे बदन पर घूम रही थीं – मेरे उभरे हुए स्तनों पर, नंगी जाँघों पर। मैंने नोटिस किया, लेकिन कुछ कहा नहीं। बल्कि मन में एक रोमांच सा हुआ।

“कल्लू, तुम भी बैठो ना। इतनी गर्मी में काम कर रहे हो।”

वो हिचकिचाया, फिर बेड के किनारे पर बैठ गया। बातें शुरू हुईं। वो अपनी घरवाली की बात करने लगा – नेपाल के गाँव में है, महीनों से नहीं मिला। उसकी आँखों में उदासी थी, लेकिन साथ में एक आग भी। “मेम साहिब, बहुत याद आती है… रातों में नींद नहीं आती।”

मैंने सहानुभूति से कहा, “अच्छा? तो तुम क्या करते हो याद आने पर?”

वो शरमाया, फिर धीमी आवाज में बोला, “जो पति-पत्नी करते हैं… वो सब याद आता है। बहुत मज़ा आता था उसके साथ।”

मेरा चेहरा लाल हो गया। मैंने कभी किसी से ऐसे खुलकर नहीं सुना था। लेकिन जिज्ञासा भी हो रही थी। “कैसा मज़ा? बताओ ना…”

वो पास खिसक आया। उसकी गर्म साँसें मेरे चेहरे पर लग रही थीं। “मेम साहिब, बताने से क्या होगा… करके दिखाऊँ तो समझ आएगा।”

मैंने नज़रें झुका लीं, लेकिन मना नहीं किया। दिल तेजी से धड़क रहा था। वो धीरे से मेरे कंधे पर हाथ रखा। उसका स्पर्श बिजली सा था। मैं सिहर गई, लेकिन पीछे नहीं हटी। “अगर अच्छा न लगे तो रोक देना,” वो फुसफुसाया।

मैंने कुछ नहीं कहा। बस आँखें बंद कर लीं। उसने मेरे गाल सहलाए, फिर होंठों पर उँगली फेरी। फिर झुककर मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिए। पहला किस… मीठा, नरम, गर्म। मैंने भी जवाब दिया। मेरे होंठ उसके साथ मिल गए। उसकी जीभ अंदर आई, मेरी जीभ से खेलने लगी। मैंने भी अपनी जीभ उससे लपेट दी। किस लंबा होता गया, गहरा होता गया। मेरे हाथ उसके चौड़े कंधों पर चले गए।

उसके हाथ मेरे टॉप के नीचे घुस गए। मेरे नंगे स्तनों को छुआ। मेरे निप्पल्स पहले से ही तन गए थे। वो उन्हें उँगलियों से मसलने लगा। मैंने सिसकारी ली, “आह्ह्ह… कल्लू…” मेरी आवाज़ काँप रही थी। वो मेरे टॉप को ऊपर उठाकर उतार फेंका। अब मैं ऊपर से पूरी नंगी थी। उसके मुँह ने मेरे एक स्तन को पूरा मुँह में ले लिया। जीभ से निप्पल चाट रहा था, चूस रहा था। दूसरा स्तन उसकी उँगलियाँ मसल रही थीं। मेरी चूत में आग लग रही थी। गीलापन शुरू हो गया था।

मैंने खुद उसके बालों में उँगलियाँ फेरीं और उसके सिर को अपने स्तनों पर दबाया। “और चूसो… हाँ… ऐसे ही…” मैं खुद हैरान थी अपनी बेबाकी पर।

फिर वो नीचे खिसका। मेरी स्कर्ट ऊपर की और पैंटी एक झटके में उतार दी। मैं पूरी नंगी उसके सामने थी। मेरी गुलाबी, चिकनी चूत पर उसकी नजरें टिक गईं। “वाह मेम साहिब… कितनी सुंदर चूत है तुम्हारी… बिल्कुल ताज़ा माल।”

उसने मेरी जाँघें फैलाईं और मुँह लगा दिया। जीभ से क्लिटोरिस को चाटने लगा। मैं चिहुँक उठी, “ओह्ह्ह गॉड… कल्लू… क्या कर रहे हो… आह्ह्ह्ह…” लेकिन पैर और फैला दिए। उसकी जीभ चूत के अंदर-बाहर हो रही थी। उँगलियाँ भी अंदर डालकर चोद रहा था। मैं पागल हो रही थी। कमर खुद ऊपर उठ रही थी। कुछ ही मिनटों में मैं पहली बार झड़ी। बदन काँप गया, चूत से रस बह निकला। वो सब पी गया।

अब बारी उसकी थी। उसने अपनी शर्ट और लुंगी उतारी। उसका लंड बाहर आया – सात इंच लंबा, दो इंच मोटा, सख्त जैसे लोहा। नसें उभरी हुईं, सुपारा लाल। मैंने पहली बार इतने करीब किसी मर्द का लंड देखा। डर लगा, लेकिन ललचाई नजरें भी। मैंने खुद हाथ बढ़ाकर उसे छुआ। गर्म, सख्त। मैंने सहलाया, ऊपर-नीचे किया। वो कराहा, “आह्ह्ह मेम साहिब… कितना अच्छा लग रहा है।”

फिर मैंने मुँह में ले लिया। जीभ से चाटा, चूसा। वो मेरे बाल पकड़कर मुँह चोदने लगा। मुझे गले तक महसूस हो रहा था।

फिर वो मुझे बेड पर लिटाया। मेरे ऊपर आया। लंड को चूत पर रगड़ा। मैंने खुद कमर उठाकर कहा, “डालो ना… अब और मत तरसाओ… चोदो मुझे।”

उसने धीरे से धक्का दिया। सिर अंदर गया। थोड़ा दर्द, लेकिन मज़ा ज्यादा। फिर आधा लंड अंदर। मेरी सील टूट गई, थोड़ा खून निकला। मैंने दाँत भींचे, लेकिन बोली, “रुको मत… पूरा डालो… फाड़ दो मेरी चूत।”

तीसरे धक्के में पूरा लंड अंदर। मैं चीखी, लेकिन खुशी की चीख। वो रुक गया, मेरे स्तनों को चूसने लगा, किस करने लगा। दर्द कम हुआ। फिर धीरे-धीरे चुदाई शुरू की। हर झटके के साथ मज़ा बढ़ता गया। मैं भी कमर उछालकर साथ देने लगी। “आह्ह… हाँ… और तेज़… कल्लू… चोदो ज़ोर से… ओह्ह्ह फक… येस…”

कमरा हमारी सिसकारियों, चुदाई की चाप-चाप और गंदी बातों से भर गया। वो मुझे अलग-अलग पोजीशन में चोदता रहा। पहले मिशनरी में, फिर मुझे ऊपर बिठाया – मैं उसके लंड पर उछल रही थी, स्तन हिल रहे थे। फिर घोड़ी बनाकर पीछे से पेला। गांड पर थप्पड़ मार रहा था। “कितनी टाइट चूत है तेरी… फाड़ दूँगा आज।”

मैं चीख रही थी, “हाँ… फाड़ दो… और गहराई तक… आह्ह्ह… मैं तेरी रंडी हूँ आज…”

फिर 69 पोजीशन – मैं उसका लंड चूस रही थी, वो मेरी चूत। मैं दो-तीन बार झड़ी। फिर उसने मेरी गांड में डालने की कोशिश की। पहले दर्द बहुत हुआ, लेकिन धीरे-धीरे मज़ा आने लगा। गांड चुदाई में भी मैं झड़ गई।

पूरे दो घंटे तक चुदाई चली। आखिर में उसने मेरे मुँह में झड़ दिया। गाढ़ा, गरम वीर्य। मैंने सब पी लिया। फिर हम नंगे ही लिपटकर लेटे रहे। पसीने से तर बदन, खुशबू से भरा कमरा।

शाम को वो जाने लगा। जाते-जाते बोला, “मेम साहिब, तुमने जो सुख दिया… ज़िंदगी भर याद रहेगा। तुम मेरी सेक्स की रानी हो।”

मैंने मुस्कुराकर कहा, “तुम भी कमाल हो कल्लू… कभी फिर आना। ये चूत हमेशा तुम्हारे लिए तैयार रहेगी।”

उसके जाने के बाद मैंने किसी को नहीं बताया। लेकिन वो दिन… वो पहली चुदाई… वो आग, वो सुख, वो पागलपन… आज भी याद आता है तो बदन में झुरझुरी दौड़ जाती है और चूत गीली हो जाती है। सच में, मेरी ज़िंदगी की सबसे हसीन और गरम याद है वो।

गर्मी की दोपहर में खुल गई चूत की सील,
कल्लू के सात इंच ने भर दी रिम्पी की खाली डील।
पहली चुदाई में दर्द भी था, मज़ा भी था अपार,
आज भी याद आए तो चूत हो जाए बेकरार।

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