कानपुर की उस पुरानी हवेली में, जहाँ गंगा की ठंडी हवा रात को खिड़कियों से आकर पर्दों को हल्का-हल्का हिलाती है और होली के रंग की महक पूरे घर में फैली रहती है, इस बार होली कुछ अलग ही थी। मैं, रमेश, २९ का, दिल्ली से छुट्टी लेकर आया था। घर में माँ-बाप, छोटा भाई और भाभी नेहा – २८ साल की, गोरी-चिट्टी, भरी हुई देह, लंबे काले बाल जो कमर तक लहराते हैं, होंठ गुलाबी और आँखें ऐसी कि एक नजर में आदमी का मन डोल जाए। भाई रोहन दिल्ली में ही नौकरी करता था, साल में दो-चार बार आता-जाता। नेहा घर संभालती, सबकी देखभाल करती, लेकिन अंदर से बहुत अकेली लगती थी।
पिछली होली में जो हुआ था, वो याद आते ही लंड तन जाता था। रंग खेलते-खेलते हम दोनों अकेले कमरे में पहुँच गए थे। नेहा की साड़ी रंग से तर-बतर, शरीर से चिपक गई थी। मैंने रंग लगाया तो हाथ उनकी कमर पर फिसला। वो हँसकर बोलीं, “अरे रमेश… इतना जोर से?” लेकिन हटी नहीं। फिर एक पल में मैंने उनका चेहरा पकड़ा और होंठ चूम लिए। वो पहले चौंकीं, फिर आँखें बंद कर लीं। जीभ अंदर डाली तो उन्होंने भी जवाब दिया। उसी दिन रात भर हमने एक-दूसरे को चखा। उनकी चूत की गर्मी, उनकी सिसकारियाँ, उनके स्तनों की नरमी – सब कुछ आज भी महसूस होता है। सुबह सब सामान्य हो गया, लेकिन वो राज हमारे बीच छिपा रहा।
इस बार होली की सुबह से ही हवा में कुछ अलग था। घर में सब रंग खेल रहे थे। माँ-बाप पड़ोस में चले गए। छोटा भाई दोस्तों के साथ गायब। नेहा और मैं घर में अकेले। वो सफेद साड़ी में थी – पतली, हल्की सी पारदर्शी। सुबह से पानी और रंग खेलते-खेलते पूरी भीग चुकी थी। साड़ी शरीर से चिपक गई थी, ब्लाउज गीला, स्तनों की गोलाई और निप्पल की उभार साफ दिख रहे थे। वो मेरे पास आई, हाथ में रंग का डिब्बा लिए। “रमेश… आज तो रंग लगाना ही पड़ेगा।” उसकी आवाज में शरारत थी।
मैंने उनकी साड़ी पूरी उतारी। पेटीकोट का नाड़ा खींचा। वो सिर्फ पैंटी में। मैंने घुटनों के बल बैठकर उनकी जांघें चूमीं। अंदर की तरफ। पैंटी गीली, रस से तर। मैंने उसे उतारा। उनकी चूत – गुलाबी, थोड़े बाल, रस बह रहा था। मैंने जीभ लगाई। वो कमर उठाकर चीखी। “रमेश… चाट… मेरी बुर… बहुत जल रही है… जीभ अंदर डाल…” मैंने जीभ अंदर डाली। क्लिट को चूसा। उँगलियाँ डालीं – दो, फिर तीन। वो कमर हिला रही थी। “आह… रमेश… उँगलियाँ… तेज… मेरी बुर फाड़… जीभ से चोद… ओह… और तेज… मैं झड़ने वाली हूं…” मैंने स्पीड बढ़ाई। वो काँपकर झड़ गई। उनका रस मेरे मुँह में बहा। मैंने सब चाट लिया। स्वाद मीठा-नमकीन। वो बोली, “रमेश… अब तेरा लंड चाहिए मुझे।”
वो उठी। मेरी शर्ट उतारी। छाती चूमी। नीचे आई। पैंट उतारी। लंड बाहर – सख्त, मोटा, नसें फूली हुईं। उन्होंने हाथ में लिया। “रमेश… कितना गरम और मोटा है तेरा… पिछले साल से और तगड़ा हो गया…” वो सहलाने लगी। फिर मुंह में लिया। जोर-जोर से चूसने लगी। जीभ सुपारे पर घुमाती। गले तक लेती। लार टपक रही थी। मैं सिसकारा। “भाभी… बहुत अच्छा… गहरा ले… आह… तेरी जीभ कमाल कर रही है… चूस… और चूस…” वो बोली, “अब डाल… मेरी बुर में आग लगी है।”
वो बेड पर लेट गई। जांघें फैलाईं। मैंने लंड उनकी चूत पर रखा। धीरे से अंदर। वो कराही। “आह… रमेश… बड़ा है… धीरे… पूरा अंदर ले रही हूँ…” मैं रुक गया। फिर धीरे-धीरे पूरा अंदर। वो चीखी। “हाँ… पूरा… अब चोद… जोर से…” मैंने धक्के शुरू किए। धीरे से तेज। वो कमर हिला रही थी। “रमेश… जोर से… मेरी बुर फाड़ दो… चोद… आह… तेज… और तेज… मेरी बुर तेरी है…” मैंने स्पीड बढ़ाई। उनके चुचे हिल रहे थे। मैंने दबाए। वो मेरी पीठ नाखूनों से खरोंच रही थी। “रमेश… अंदर झड़… मुझे भर दे… गर्म माल डाल… मैं तेरी हूँ…” मैंने और जोर से धक्के मारे। एक साथ झड़ गए। मेरा गरम माल उनकी बुर में भर गया। वो काँपकर थम गई।
फिर मैंने कहा, “भाभी… आज गांड में?” वो शरमा गई। “धीरे से… पिछली बार से याद है…” मैंने ऑयल लगाया। पहले उंगली। वो सिहर उठी। “रमेश… आह… दर्द… लेकिन अच्छा…” फिर दो उँगलियाँ। वो कमर हिला रही थी। “रमेश… और अंदर… तैयारी कर रही हूँ…” फिर लंड। धीरे से अंदर। वो चीखी। “आह… रमेश… बड़ा है… धीरे…” मैं रुक गया। फिर धीरे-धीरे पूरा। वो बोली, “अब चोद… मेरी गांड चोद…” मैंने धक्के शुरू किए। वो चीख रही थी। “रमेश… जोर से… फाड़ दो मेरी गांड… आह… बहुत मजा आ रहा है… अपनी बुर में उँगलियाँ डाल रही हूँ…” मैं तेज हो गया। वो अपनी बुर में उँगलियाँ डाल रही थी। हम दोनों झड़ गए।
दिन भर रंग खेलते रहे। लेकिन हर बार अकेले मिलते ही चुदाई। शाम को सब घर लौट आए। लेकिन रात में फिर कमरे में। नेहा मेरे बिस्तर पर। रात भर चुदाई। उनकी सिसकारियाँ दबाकर। “रमेश… चुप… कोई सुन लेगा…” लेकिन मजा कम नहीं हुआ।
हॉली खत्म हुई। मैं दिल्ली लौटा। लेकिन वो यादें रह गईं। नेहा की बुर की गर्मी, उनकी सिसकारियाँ, उनका स्पर्श। कानपुर की उस हवेली में हमारा राज छिपा रहा। हर होली पर मिलने का वादा। जहाँ रंग सिर्फ बाहर नहीं, अंदर भी लगते हैं।